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संविधान सभा में डॉ.अम्बेडकर की चेतावनी और माओवाद

Posted On: 21 Sep, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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२५ नवम्बर १९४९ को संविधान सभा में अपने अंतिम संबोधन में डॉ.अम्बेडकर ने चेतावनी देते हुए कहा था थ कि “२६ जनवरी १९५० को एक नई दुनिया में प्रवेश करने जा रहे है |जहा राजनीत में हम समान होगे ,वही सामाजिक और आर्थिक छेत्र मे हम असमान होगे राजनीत में हम एक वोट एक व्यक्ति एक मूल्य को मान्यता देगे ,लेकिन सामाजिक और आर्थिक संरचना के कारण हम एक व्यक्ति एक मूल्य को इंकार कर रहे होगे |जीवन कें इन अंतरविरोधो को हम कितने दिनों तक जारीरख सकेगे.हम कब तक अपने आर्थिक व सामाजिक जीवन में .समानता को नकारते रहेगे |हम यदि लम्बे ऐसा करते है तो हमें इसकी कीमत अपने राजनीतिक लोकतंत्र को संकट में ड़ाल कर चुकानी पड़ेगी |हमें जल्द से जल्द इस अन्तर्विरोध को हल करना होगा ,वरना इस असमानता के शिकार लोग इस लोकतंत्र के इस ढाचे को उखाड़ फेकेगे जिसे इस असेम्बली ने इतनी मेहनत से बनाया है |”इसके परिप्रेच में हमें माओवाद के उभार पर विचार करना होगा सरकार के मिथ्या प्रचार से इसका समाधान नहीं होने वाला जिस तरह मीडिया और सरकार अपने स्वार्थ में अनर्गल रूप से हिंसा औरअहिंसा पर अभिनेताओ ,सेलिब्रेटी और अवकास प्राप्त पत्रकारों को स्टडियो में बैठा कर बहस चला रहे है उससे गंभीर समस्या का सरलीकरण हो रहा है भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री वेंकटरमण क़ी चेतावनी को भी हलके में नहीं लेना चाहिए जैसा कि उन्होंने भी कहा था कि गरीबो के समुद्र में अमीरी के टापू जनता अधिक दिनों तक देखती नहीं रहेगी किसी दिन इसे उखाड़ फेकेगी मीडिया यही समझाने में लगा है कि मओवादियो की समस्या कानून व्यवस्था की समस्या है और इसे बलपूर्वक समाप्त किया जा सकता है जब कि यह एक सामाजिक और आर्थिक समस्या है इसका समाधान राजनीतिक ही हो सकता है.यह अपने को और जनता को भुलावे में रखने वाली बात है जब कि मओवादियो और आदिवासियो और हासिए के बचितो कापूरा समर्थन इन्हें मिल रहा है नहीं तो तो यह असंभव था कि हजारो की संख्या में जुट कर जुट कर ७४ सुरछा बजो की हत्या कर देते और प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं हुई विद्रोह की सुरुआत हो चुकी है सलवा जडून जिसपर सवोच्च न्यायलय ने भी सरकार को फटकार लगाई है उसके भी गंभीर निहितार्थ है हने इस पर भी विचार करना होगा कि एक तरफ गरीबो की संख्या बढती जा रही है और जले पर नामक की तरह मंत्रियो के बेतुके बयान आ रहे है .आजतक सरकार गरीबी का पैमाना ही नहीं तय कर पा रही है अर्जुनसेन समिति कि रिपोर्ट है कि 77%जनता २० रुपये रोज पर गुजरा कर रही है तो सक्सेना कमिटी कुछ और आकड़ा प्रस्तुत कर रहा है यानि गरीबी के आकलन में भी किसी तरह की बाजीगीरी कर उनकी संख्या कम दिखाना चाह रही है उस तरह से फर्जी आकड़ो से समस्या का समाधान नामुमकिन है २००८ में योजना आयोग द्वारा नियुक्त विशेग्यो के एक समूह ने रिपोर्ट पेश की—अतिवादी प्रभावित छेत्रो में विकास सम्न्धित चुनौतिया —- जिसमे यह कहा गया था कि”नाक्स्सल्वादी आन्दोलन को एक राजनीतिक आन्दोलन के रूप ने स्वीकार किया जाना चाहिए ,जिसका भूमिहीन किसानो,गरीब आदिवासियो के बीच एक गंभीर आधार है.उसके पैदा होने और फलने फूलने को उनलोगों की सामाजिक और अर्थक स्तिथिओ का महत्व्पुर्द स्थान है
नाक्सस्ल्वादी लोग दिल्ली में नहीं पनपे बल्कि इनके पनपने का स्थान उड़ीसा ,झारखण्ड चतिस्दर्ध और आंध्र के आदिवासी इलके है जहा आजभी कोग चूहों को मर केर खाते है.
अभी ९ फरवरी को सर्वोच्च यायालय ने फासला देते हुए ४ लोगो की हत्या के आआ१ न्याय्म्रूउर्ती एच.एन.दानु और प़ी.सदाशिव ने अपराध और गरीब पैर कहा है क़ि “मौत क़ि सजा सुनते समय कहा अभियुक्त को फासी क़ि सजा देते समय अभियुक्त का आर्थिक स्टर देखना भी बहुत जरुरी है उन्हों ने १९९५ में ४ लोगो क़ि हत्या में फासी क़ि सजा को माफ़ करते हुए आजीवन कारावास जी सजा सुनैउन्हो ने कहा क़ि इन लोगो न्र गरीबी के कारन ही बन्दुक उठाई थियः भी कहा क़ि यह सजा भी बहुत अधिक है.उनके पास पेट भरने को अनाज होता तो बदूक नहीं उठाते उन्होंने कहा क़ि हर गरीब अपराधी लेकिन नहीं होता लेकिन हर अधिकारी का रिश्ता गरीबी से जरुर होता है,
अज हम देख रहे है क़ि माओवाद या नाक्सस्ल्वाद के रूप में डॉ. अम्बेडकर क़ी चेतावनी साकार हटी दिख रही है जिस तरह एक छोटे से गाव से सुरु हुआ अन्दोलम एक चौथाई देश के हिस्से को अपनी चपेट में ले चूका सुरछा बल उन्हें रोकने में नाकाम साबित हो रहे है.
आइये डॉ. अम्बेडकर की चेतावनी पैर शुध्ध बहस के लिए सभी जागरूक बंधुओ को आमंत्रित केर रहे है क़ि इस बारे में अपनी बहुमूल्य विचारो से आपस ने साझा करे क़ि इस समस्या का वस्त्विज स्तिथि से अवगत हो सके.|

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shuklaom के द्वारा
December 11, 2010

BANDHO. mai i0 sitambarse bast raha ti aj apne vicharo ko rskh raha hu.


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