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मानवाधिकार के वास्तविक सवाल

Posted On: 16 Sep, 2010 Others में

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आजकल मानवाधिकारों की चर्चा कुछ अधिक होने लगी है जबसे नक्सलवादियो का हमला तेज हुआ है और सरकार की तरफ से ग्रीन हंट के द्वारा मुकाबला किया जा रहा है,मीडिया और वह भी इलेक्ट्रोनिक मीडिया इस संवेदन शील विषय को हिंसा और अहिंसा के बीच चलाने की साजिश करार दे कर kerरहा है.मानवाधिकार की बात जबसे दंतेवाडा में ७० से अधिक सुरचाकर्मियो की हत्या नक्सलवादियो द्वारा हुई जिसके कारन आदिवासियो के परिप्रेच चल रही बहस माओवादियो के द्वारकी जा राही हिंसा को एकतरफा बना दिया सिनेमा के अभिनेताओ और अवकास प्राप्त पत्रकारों तथा सेलिब्रेतिएस को बैठा केर इतने गम्भीर विषय पैर सतही रूप से बहस को माओवादी हिंसा और सुरचाबलो के मानवाधिकारों के मध्य ही सीमित कर दिया गया है इनसब के बीच आदिवासियो और हासिए पैर पड़े दलितों के मानवाधिकारों की बात कोई भूल कर भी नहीं कर रहा है.क्या मानवाधिकार सिर्फ गोलिओ से मरने और मारने वाले से ही सम्बंधित है.अगेर कोई भूख से या बीमारी से लाचारी में बगैर दवा इलाज के मरता है तो उसके विषय में मानवाधिकार का प्रश्न खड़ा होता है या,नहीं//अगेर बार–बार किसी की जमीन जबर्दस्ती छीनीजाएगी और असका उचित पुनेर्व्स्द किये बिना भीधोबी के कुत्ते की तरह छोड़ दिया जायेगा तो उनका प्रश्न मानवाधिकार का सवाल बनता है या नहीं.अज के मीडिया घराने बहुत ही शातिराना तरीके से इन सब राजनातिक और आर्थिक मुद्दों का विश्लेषण किये बिना हिंसा अहिंसा पैर बहस चला अपनी उर्जा नष्ट कर रहा है तथा मध्य वेर्ग को भ्रमित कर उन्हें वास्तविकता से awgat नहीं होने देता भारतीय मध्य वेर्ग दूरदर्शन के माध्यम से सरकारी प्रेस विग्यपतियो को समाचार मान ग्रहद करता है और चैनेल वाले भी जो सरकार ने बता दिया दिखा दिया.ड्यूटी ख़त्म जब की ध्यान से विश्लेषण किया जय तो यहाँ मानवाधिकारों का सबसे ज्यादा हनन आदिवासियो का आजादी के बफ से ही हो रहा है.उनके पुश्तो की विरासत जंगल उनसे छीन लिए गए अब वे लोग उन्ही jangalo में jalouni lakadi tak के लिए mahrum कर diye गये bharat सरकार के gramid vikas mantralay की report के anusar आजादी के bad 40%आदिवासियो का ek या ekse अधिक बार visthapan हुआ है.akhir vikas का yah koun sa modal है की बार–बार sdivasio और banchito को ही keemat chukani padati है,jabki उन्हें ek dhele का fayda नहीं hota.dusari बात जो अधिक mahatvpurd है wah आदिवासियो के najdoori का है आदिवासियो या kahe naxslvadio का mukhy virodh majdoori के प्रश्न पैर hota है.जब sarakar ने kanun बना कर nyuntam majdoori tay कर dii तो क्या vajah है की सबसे अधिक hathiyar isi में uthana pddata haui.jitani kam majdoori आदिवासियो को milati haiutana pure vishw में chalati है. akhir kyo उन्हें आजादी के 63 sal bad भी swasth,chikitsa shilcha ityadi naseeb नहीं इन सब बातो के अतिरिक्त्त यह भी प्रश्न यह भी है की वह कौन सी स्तिर्गिया है की डॉ.सेन जैसा जगली नीरीह बंचित आदिवासियो को चिकित्त्त्सा सेवा सेने वाले डॉ.सेन प्रशासन के लिए इतने बड़े खतरा बन जाते है उन्हें उस धरा में बंद केर दसिय जाता है जहा २ साल जमानत नहिमिलाती.तो यहाँ प्रश्न मात्र हिंसा अहिंसा कीनही होनी चाहिए नहीं तो दूसरा प्क्चास यह कहेगा की सुरचाबल वह कोई टहलने नहीं ग्स्ये थे.इस तरह मानवाधिकारो का प्रद्ष्ण व् यापक परिवेश में ही होने चाही.ह्ह्ह्हह्ह्ह्हप्र्ताष्ण यह भी है की आजादी के ६३ साल बाद भी मसनव विकास सुचांक में अंतिम पायदान पैर क्यों है. यह भी राष्ट्रिय शर्म की बात होनी चाहिए

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आर.एन. शाही के द्वारा
September 17, 2010

आपका दर्द समझे जाने के लायक़ है … बधाई ।

    shuklaom के द्वारा
    December 16, 2010

    शाही जी ऐसा ही विश्यास बनाये रखे धन्यवाद .

Piyush Pant के द्वारा
September 16, 2010

एक अच्छे और सार्थक लेख के लिए हार्दिक बधाई……….. http://piyushpantg.jagranjunction.com/


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